सालाना उर्स शरीफ़
हज़रत सैलानी बाबाके उर्सकी शुरुआत सन १९०८ से हुइ. तबसे लेकर आजतक यहां आनेवाले मुरादमंदोकी तादादमे काफ़ी इजाफा हुआ है. भारतके कोने कोनेसे तकरीबन ८ से १० लाख लोग हर साल यहांके उर्समे हाजरी देने आते है. बाबाका उर्स हर साल मार्च महिनेमे मनाया जाता है. उर्सका ये जशन २० से २५ दिनोका होता है. होली सैलानी बाबाके उर्सकी शुरुआत होलीसे होती है. यहांकी होली नारीयलकी होली इस नाम से जानी जाती है. इस होलीमे नरीयलके अलावा और कुछभी जलाया नही जाता. अगर कोइ शख्स किसी बीमारी या शैतानी असरसे परेशान हो, उस शख्सके बदनपर नारीयल उतारकर इस होलीमे जलानेसे वो शख्स पूरी तरह ठीक हो जाता है. इसीलिये सिर्फ होलीके लिये भारतके कोने कोनेसे लाखो मुरादी यहां आते है और फैज़ पाते है. संदल होलीसे पांचवे दिन यानी पंचमीके रात बाबाकी दरगाहका संदल मनाया जाता है. इस संदलकी बहोत पुरानी रिवायत है की संदलको ऊंटनीपर सजाकर पासहीके गाव पिंपळगाव सराईसे दरगाहतक बडेही शानो शौकतसे लाया जाता है. इस मजमेको देखने बडी तादादमे मुरादी यहां हाज़ीर होते है. इस मौकेपर सैलानीबाबा ट्रस्ट्की जानीबसे काफ़ी इंतेजाम किया जाता है. हिफ़ाज़ती लिहाज़से कडा पोलीस बंदोबस्त होता है. ढोल ताशोके साथ ये जुलूस दरगाह पहुचनेपर संदल और चादर चढाइ जाती है. इस्के बाद तीन दिनोतक उर्स शरीफ़ मनाया जाता है. फ़ातिहा ख़ानी उर्सके पांचवे दिन सैलानि बाबा ट्रस्टकी जानीबसे सुबह ८:३० बजे फ़ातिहा पढी जाती है और १० से १५ क्विंटल तबर्रुख़(महाप्रसाद) मुरादियोमे तक़सिम किया जाता है.इस दिनके बाद भी दस से पंधरा दिनोतक मुरादियोका आना जाना लगा रहता है.